बच्चे का जन्म अक्सर सबसे खुशहाल पल कहा जाता है। सोशल मीडिया पर सब परफेक्ट लगता है। परिवार को वारिस मिल जाता है, लेकिन इस तस्वीर के पीछे एक साइलेंट स्ट्रगल भी छिपा होता है। कई नई मदर्स इस दौर में इमोशनल रोलरकोस्टर से गुजरती हैं, जिसे हम पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) कहते हैं। दुख की बात यह है कि इसके बारे में अवेयरनेस कम है और मिथक ज्यादा हैं। चलिए इस आर्टिकल में इन मिथकों को थोड़ा गहराई से समझते हैं।
मिथक 1: पोस्टपार्टम डिप्रेशन सिर्फ कमजोर महिलाओं को होता है
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यह सोच बहुत गलत है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन का किसी महिला की पर्सनैलिटी या उसकी स्ट्रेंथ से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक मेडिकल कंडीशन है, जो डिलीवरी के बाद शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी, थकान और नई जिम्मेदारियों के दबाव से जुड़ी होती है।
अक्सर जो महिलाएं बाहर से बहुत स्ट्रॉन्ग और कॉन्फिडेंट दिखती हैं, वही अंदर से सबसे ज़्यादा जूझ रही होती हैं। इसलिए इसे “कमजोरी” कहना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह महिलाओं को गिल्ट में डाल देता है। असल में, PPD किसी को भी हो सकता है और इसे समझना और स्वीकार करना ही पहला कदम है।
मिथक 2: अगर आप अपने बच्चे से प्यार करती हैं, तो डिप्रेशन नहीं हो सकता
सोसाइटी ने मां बनने को इतना प्योर बना दिया है कि बाकी इमोशन्स के लिए जगह ही नहीं छोड़ी है। लेकिन सच्चाई यह है कि आप अपने बच्चे से बेहद प्यार कर सकती हैं और फिर भी उदासी, चिड़चिड़ापन या खालीपन महसूस कर सकती हैं।
मां बनने के बाद अचानक ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है। नींद कम हो जाती है, रूटीन बदल जाता है और खुद के लिए समय लगभग खत्म हो जाता है। ऐसे में मिक्स्ड इमोशन्स बिल्कुल नॉर्मल हैं। लेकिन जब ये फीलिंग्स लंबे समय तक बनी रहें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का साइन हो सकता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने बच्चे से कम प्यार करती हैं।
मिथक 3: पोस्टपार्टम डिप्रेशन तो बस कुछ दिनों का होता है
बेबी ब्लूज़ और पोस्टपार्टम डिप्रेशन को अक्सर लोग एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में फर्क है। बेबी ब्लूज़ डिलीवरी के बाद के शुरुआती दिनों में होता है और आमतौर पर 1-2 हफ्तों में अपने आप ठीक हो जाता है। इसमें हल्की उदासी, रोने का मन या मूड स्विंग्स शामिल हो सकते हैं।
लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें- जैसे लगातार उदासी रहना, एंग्जायटी, थकान, या बच्चे से कनेक्ट न कर पाना, तो ये पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है। इसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है क्योंकि बिना सही मदद के यह और सीरियस हो सकता है। इसलिए ‘ये तो अपने आप ठीक हो जाएगा’ सोचकर चुप रहना सही नहीं है।
मिथक 4: मां को मजबूत बनना चाहिए, मदद मांगना गलत है
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हमारी सोसाइटी में महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वो सब कुछ अकेले संभाल लें, खासकर मां बनने के बाद। लेकिन यह सोच दबाव पैदा करती है। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा कदम है। चाहे वो आपके पार्टनर से हो, परिवार से या किसी डॉक्टर/थेरेपिस्ट से। जब आप अपनी फीलिंग्स को दबाती हैं, तो वे और बढ़ सकती हैं। लेकिन जब आप खुलकर बात करती हैं, तो हीलिंग शुरू होती है।
मिथक 5: पोस्टपार्टम डिप्रेशन का मतलब है कि आप अच्छी मां नहीं हैं
यह मिथक महिलाओं को सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन और आपका ‘अच्छी मां’ होने में कोई रिलेशन नहीं है। यह एक हेल्थ कंडीशन है, न कि आपकी पेरेंटिंग स्किल का मेज़रमेंट।
कई महिलाएं इस डर से अपनी फीलिंग्स शेयर नहीं करतीं कि लोग उन्हें जज करेंगे। लेकिन सच यह है कि आप एक अच्छी मां हैं, जो बस एक मुश्किल दौर से गुजर रही हैं।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन को समझना और इसके बारे में खुलकर बात करना बहुत ज़रूरी है। मिथकों से बाहर निकलकर सच्चाई को अपनाएं, ताकि हर मां को वो सपोर्ट मिले, जिसकी उसे ज़रूरत है।
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