शाहिद कपूर और विशाल भारद्वाज का एक साथ किसी फिल्म में होना एक जानलेवा कॉम्बिनेशन है। जब-जब विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर साथ आते हैं, सिनेमा सिर्फ कहानी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक एक्सपीरियंस बन जाता है। ‘कमीने’ और ‘हैदर’ के बाद ‘O Romeo’ से उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं और पहले के 60 मिनट में ही ये फिल्म बता देती है कि ये दुनिया खूबसूरत भी है और खौफनाक भी।

फिल्म की शुरुआत ही मैक्सिमम गैंगस्टर मोड में होती है। कैमरा हर फ्रेम को पेंटिंग की तरह ट्रीट करता है और सिर्फ एक गाने से एंट्री करने वाली माधुरी दीक्षित को देख दिल फिर एक बार “धक-धक” करने लगता है। हर किरदार कहानी में एक और परत जोड़ता है, फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है आप उन किरदारों में उतना ही इन्वेस्ट होने लगते हैं। चलिए आपको बताएं कि इस फिल्म में आखिर क्या है खास?

O Romeo की दुनिया डार्क है, पर डिटेल में है रिच

Is O Romeo based on a true storyImage Source

शाहिद कपूर का गैंगस्टर अवतार (उस्तरा) सटीक है- यह न ज़्यादा लगता है और न कम। तृप्ति डिमरी सिर्फ ग्लैम नहीं, बल्कि कहानी का ड्राइविंग फोर्स बनकर आती हैं। फिल्म में वह अफशां की भूमिका निभा रही हैं, जो बदला लेने के लिए उस्तरा से हाथ मिलाती है। यह कैसा बदला है, वो आपको फिल्म देखकर ही समझ आएगा।

फिल्म में फरीदा जलाल और नाना पाटेकर भी हैं। दोनों ही दिग्गज हैं और सिनेमा के पुराने चावल हैं, इसलिए एक-दो फ्रेम भी उनके लिए काफी हैं। अफ़सोस बस इतना है कि विक्रांत मैसी का कैमियों उस तरह से काम नहीं करता, जिस तरह से करना चाहिए था।

उस्तरा के साथी रहे खूंखार गैंगस्टर जलाल यानी अविनाश तिवारी को विलेन के रूप में देखना दिलचस्प लगता है। फिल्म में उनकी एंट्री इंटरवल से पहले होती है, लेकिन समझ आ जाता है कि सेकंड हाफ में कमाल करेंगे। वह हर सीन को अपनी परफॉर्मेंस से दमदार बनाते हैं।

फिल्म अपनी दुनिया को गढ़ने में टाइम लेती है

What are the reviews of O Romeo movieImage Source

विशाल भारद्वाज का स्लो-पेस स्टाइल समझ आता है, लेकिन फिल्म शुरुआत से ही धीमी लगती है। इस सफर में कई सारे एलिमेंट्स जुड़ते जाते हैं, जो एक वक्त के बाद फिल्म में दखल देने लगते हैं। हालांकि, बैकग्राउंड म्यूज़िक कहानी और ड्रामा फिल्म को थोड़ा उठाते भी हैं।

O Romeo में बहुत-सी चीज़ें एक साथ चलती रहती हैं, जिसकी वजह से ध्यान बंटता हुआ-सा लगता है। विशाल भारद्वाज की फिल्म में गाने न हों, ऐसा नहीं हो सकता है। इस फिल्म में भी बेहतरीन गाने हैं। बैकग्राउंड स्कोर अच्छा लगता है, लेकिन कुछ जगहों पर भटकाता हुआ नज़र आता है।

O Romeo में क्या चला और क्या नहीं?

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विशाल भारद्वाज जादूगर हैं और यह उनकी फिल्मों में पकड़ी गईं बारीकियों में दिखता है। इस फिल्म में भी हर टाइमलाइन को उन्होंने बेहतरीन ढंग से दिखाया है। अखबारों की हेडलाइन के ज़रिए ये डिटेल्स आपको याद हो जाती हैं। इतना ही नहीं, हर सीन को परफॉर्म करते किरदार भी बेमेल नहीं लगते। कुछ डायलॉग्स सीधे दिल पर लगते हैं और फिल्म के मूड के साथ पूरी तरह फिट बैठते हैं।

सिनेमैटोग्राफी शानदार है। विशाल की हर फिल्म की तरह O Romeo में भी हर फ्रेम में रोशनी और साये ऐसे खेलते हैं जैसे कहानी खुद कैमरे से सांस ले रही हो। उनकी फिल्मों का विजुअल टोन किरदारों के दर्द, गुस्से और खामोशी को बिना शब्दों के भी बयां कर देता है।

वहीं, बात करें एक्शन की, तो उसका भी जवाब नहीं है। हां, फिल्म जहां धीमी शुरुआत करती है, वहीं लास्ट आवर में रफ्तार पकड़ती है, मगर कुछ जगहों पर स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ लगता है। क्लाइमेक्स दमदार है, पर काफ़ी हद तक प्रिडिक्टेबल नज़र आता है।

शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी फिल्म की जान हैं। गुलज़ार के गानों ने फिल्म को बांधे रखने की पूरी कोशिश की है।

Verdict:
O Romeo इश्क़ और इंतक़ाम की ख़ूबसूरत दास्तान है। बस रफ्तार और स्क्रीनप्ले टाइट होते, तो असर शायद और गहरा होता। शाहिद-विशाल की जोड़ी लंबे समय बाद स्क्रीन पर आई है। इस जोड़ी को मिस करने वाले फैन्स फ़िल्म ज़रूर देखें।

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