मैं बीते दिनों एक रिपोर्ट पढ़ रही थी, जिसमें लिखा था कि दुनिया भर में अब महलिाएं पुरुषों से ज़्यादा डिवोर्स केसेस फाइल कर रही हैं। अगर डेटा देखा जाए तो महिलाएं अपनी शादी को खत्म करने का फैसला पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा लेती हैं। डिवोर्स लेना आसान नहीं होता। फिर महिलाएं क्यों तलाक लेती हैं?
अक्सर, कपल्स महीनों या कभी-कभी सालों तक एक-दूसरे को सोचते और समझते हैं, तब जाकर अलग होने का फैसला लिया जाता है। लेकिन, जब बात फाइनल कॉल लेने की आती है, तो एक क्लीयर पैटर्न सामने आता है। हमारे और वेस्टर्न कल्चर में तलाक लेने का फैसला ज़्यादातर महिलाएं ही लेती हैं। मगर ऐसा क्यों? चलिए इस आर्टिकल में डेटा और साइकोलॉजिकल जवाबों के ज़रिए इस विषय को समझें।
डेटा बताता है महिलाएं ज़्यादा लेती हैं अलग होने का फैसला

अमेरिका की बात करें, जहां No-Fault डिवोर्स 50 स्टेट्स में लीगल है, वहां अमेरिकन सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन के एस्टिमेट्स के मुताबिक लगभग 70% डिवोर्सेस महिलाएं फाइल करती हैं।
यूनाइटेड किंगडम में भी ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के डेटा के हिसाब से, 2019 में इंग्लैंड और वेल्स में 62% डिवोर्सेस महिलाओं ने पेटिशन किए।
अब अगर इंडिया की बात करें, तो इंडिया का डिवोर्स रेट बाकी देशों से काफी कम है। यहां डिवोर्स रेट लगभग 1% से 1.1% बीच है, लेकिन डिवोर्स फाइल करने वाली संख्या में काफी बढ़ोतरी देखी गई है, खासतौर से, अर्बन एरिया में।
कुछ स्टडीज के मुताबिक, अलग-अलग जगहों पर 57% से 75% तक डिवोर्स पीटिशन्स महिलाओं की तरफ से फाइल की जाती हैं।
सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? कुछ केसेस में इसका जवाब इमोशनल ज़रूरतों से जुड़ा हुआ है। हालांकि, कई बार वजह इतनी सिंपल नहीं होती। इन नंबर्स के पीछे और भी लेयर्स हैं और शायद जितना हम ऊपर से देखते हैं, कहानी उससे काफी ज़्यादा अलग है।
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महिलाएं क्यों तलाक लेती हैं?
महिलाएं ज़्यादा केसेस में डिवोर्स या ब्रेकअप का फैसला लेती हैं, तो इसका कारण जल्दबाजी या मॉर्डन माइंडसेट नहीं है। इसके पीछे स्ट्रॉन्ग साइकोलॉजिकल फाउंडेशन होता है। वे अलग होने का फैसला बहुत सोच-समझकर करती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हम इमोशनल सच्चाई को पहले फील करती हैं, ज़्यादा प्रोसेस करती हैं और जब किसी रिश्ते में रहना साइकोलॉजिकली अनसेफ लगता है, तब उसे छोड़ते हैं।
डिवोर्स फाइल करने के बड़े कारण क्या हैं?

इमोशनल अवेयरनेस ज़्यादा होने के कारण
साइकोलॉजिकली, महिलाएं अपने इमोशन्स को पहले नोटिस करती हैं और उन्हें आर्टिकुलेट भी बढ़िया तरीके से कर पाती हैं। जब रिश्ते में इमोशनल नेग्लेक्ट, डिसकनेक्शन या डिससैटिस्फैक्शन होता है, तो महिलाएं उसे एडजस्ट करने वाले फेज़ में ज़्यादा देर तक नहीं छोड़तीं। उनके लिए फिर यह सर्वाइल बन जाता है।
इमोशनल लेबर इम्बैलेंस होने के कारण
महिलाएं क्यों तलाक लेती हैं, इस सवाल का एक जवाब यह है कि हम इमोशनल लेबर इम्बैलेंस होने के कारण ऐसा फैसला लेती हैं। शादी हो या फिर कोई भी रिश्ता, महिलाएं उसमें न दिखने वाला इमोशनल लेबर करती हैं। कन्फ्लिक्ट मैनेज करना, रिलेशनशिप को इमोशनली स्टेबल रखना, मूड्स को समझना, आदि। जब ये सारे एफर्ट्स एक- तरफा लगने लगते हैं, तो साइकोलॉजिकल बर्नआउट होता है। ब्रेकअप या डिवोर्स उनके लिए सेल्फ-प्रिजर्वेशन बन जाता है।
इमोशनली डिटैच होने के कारण

हम अक्सर रिश्ते को बचाने की कोशिश करती हैं। चाहे बात करनी हो या कॉम्प्रोमाइज़, हम सब करती हैं। जब लगने लगता है कि बदलाव नहीं होने वाला है, तब हम इमोशनली डिटैच होने लगती हैं। इसलिए, अलग होने का फैसला कभी भी अचानक नहीं होता, वो पहले से इमोशनल तरीके से प्रोसेस किया जा चुका होता है।
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सेल्फ-वर्थ और बाउंड्री का शिफ्ट होने के कारण
मॉर्डन साइकोलॉजी यह भी बताती है कि महिलाएं आज बाउंड्रीज को ज़्यादा सीरियसली लेती हैं। बेइज्जती, अनहैप्पीनेस या अलग डाइनैमिक्स को अब वो नॉर्मल मैरिज प्रॉब्लम्स नहीं मानती हैं। डिवोर्स या ब्रेकअप उनके लिए असफलता नहीं, बल्कि सेल्फ-रिस्पेक्ट को पाने और बनाए रखने का अधिकार होता है।
महिलाएं क्यों तलाक लेती हैं, इसके पीछे कई सारी बाते होंती हैं, कई जजमेंट्स होते हैं। एक रिश्ते के खत्म होने का दुखा बड़ा होता है, लेकिन यह नए चैप्टर का पार्ट भी है। इसे एक असफलता की तरह देखने से अच्छा है कि आप इसे एक मौके की तरह देखें।
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