चलती कार में पांच लोग… एक औरत…और फिर एक रेलवे ट्रैक, जहां रेप करने के बाद उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह एक अपराध की शुरुआत है, लेकिन फ़िल्म अस्सी की असली कहानी वहां से शुरू होती है, जहां वो अपराध ख़त्म होता है। कहानी शुरू होती है तब जब वह औरत बच जाती है।

उस औरत के लिए और उस जैसी तमाम औरतों के लिए बचे रहना खुद एक जंग है। और इस जंग का सबसे मुश्किल हिस्सा वो नहीं है जो अदालत में होता है, थाने में होता है या खबरों में आता है। सबसे मुश्किल हिस्सा वो है जो उसके अंदर, उसके मन की गहराइयों में, चुपचाप चलता रहता है। यह लेख उसी अनदेखी हिंसा के बारे में है। आइए इस लेख में जानें कि कैसे फ़िल्म अस्सी कैसे उस हिंसा के बारे में बात करती है।

अस्सी की कहानी क्या है?

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फ़िल्म की कहानी दिल्ली की एक स्कूल टीचर परिमा (कानी कुस्रुति) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे एक पार्टी से लौटते वक्त मेट्रो में अगवा कर गैंगरेप का शिकार बनाया जाता है और मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बाद शुरू होती है न्याय की लंबी और थका देने वाली लड़ाई।

रावी (तापसी पन्नू) नाम की वकील सिस्टम पर भरोसा रखते हुए केस लड़ती है, लेकिन इस दौरान पुलिस की लापरवाही, सबूतों से छेड़छाड़, गवाहों पर दबाव और समाज की बेरुखी सामने आती है। अमीर घरों से आए आरोपी बेखौफ घूमते हैं, जबकि पीड़िता और उसका परिवार सामाजिक शर्म और मानसिक यातना से जूझता है।

फ़िल्म अस्सी की असली कहानी अंदर की लड़ाई को दर्शाती है

फिल्म अस्सी बेहद सटीक तरीके से दिखाती है कि यौन हिंसा के बाद सर्वाइवर के मन में कैसी उथल-पुथल चलती है। बार-बार वही सवाल, “क्या मेरी गलती थी?” “अगर मैं उस रात बाहर न जाती तो…?” यह वही गिल्ट है जिसे साइकोलॉजी की भाषा में Secondary Trauma और Internalized Blame कहा जाता है।

Journal of Trauma, Violence & Abuse में पब्लिश्ड एक meta-analysis के मुताबिक़, सेक्शुअल असॉल्ट के एक हफ़्ते बाद 81% survivors में PTSD के लक्षण दिखते हैं। एक महीने बाद 75% clinically इसकी diagnosis में आ जाते हैं। और एक साल बाद भी, 41% अभी भी उस trauma को जी रहे होते हैं। ये सिर्फ़ आकड़े नहीं हैं, बल्कि हर नंबर के पीछे एक इंसान है, एक औरत है जो रात को अचानक चौंककर उठती है, जो किसी परछाईं से डर जाती है, जो अपने ही शरीर में अजनबी महसूस करती है।

फ़िल्म की नायिका ने दिखाई PTSD की Complex दुनिया

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अक्सर लोग समझते हैं कि PTSD में आप डरे हुए रहते हैं। मगर ऐसा नहीं है, इसकी असलियत कहीं ज़्यादा जटिल है। फ़िल्म अस्सी की नायिका भी इन्हीं परतों से गुजरती है। उसका शरीर धीरे-धीरे ठीक हो रहा होता है, लेकिन उसका मन उसी रात में अटका रहता है। बाहर से सब “नॉर्मल” दिख सकता है, पर अंदर लगातार चलती लड़ाई है।

इस पर दिल्ली की शक्ति शालिनी की सोशल वर्कर मीरा सहगल कहती हैं, “जो औरत बाहर से बिल्कुल ठीक दिखती है, काम पर जाती है, हंसती है, वो अंदर से सबसे ज़्यादा टूटी हुई हो सकती है। वो ‘ठीक दिखना’ भी एक coping mechanism है।”

इसमें सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी लोगों की यह है कि अगर कोई लड़की रोई नहीं, तो झूठ बोल रही है। Trauma में सुन्न हो जाना उतना ही आम है जितना रोना, बल्कि कई बार ज़्यादा। दिमाग़ उसे बचाने के लिए खुद को बंद कर लेता है।

सर्वाइवर के टैग में सिमट जाती है पहचान

फ़िल्म अस्सी का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि वह दिखाती है कि घटना के बाद दुनिया कैसे बदल जाती है। एक महिला, जो पहले सिर्फ एक टीचर, बेटी या दोस्त थी, अचानक “रेप सर्वाइवर” बन जाती है।

लोगों की नज़र बदल जाती है। कुछ में दया, कुछ में असहजता, कुछ में जजमेंट आ जाता है। परिवार भी दो हिस्सों में बंट सकता है, जैसे एक जो लड़ना चाहता है और दूसरा जो ‘इज्जत’ बचाने के लिए चुप रहना चाहता है।

यह वही वजन है, जिसे फ़िल्म बहुत ईमानदारी से सामने रखती है। सर्वाइव करना सिर्फ सांस लेते रहना नहीं है, यह हर दिन समाज की नज़रों का सामना करना भी है।

Disha, Vikalp Sansthan, और RAHI जैसे संगठन भारत में survivors के साथ काम करते हैं। इनके counselors बताते हैं कि रिकवरी में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है, जब किसी ने पहली बार कहा हो “यह तुम्हारी गलती नहीं थी।” यह कहना किसी सर्वाइर को बहुत ज़्यादा रिलैक्स कर देता है। उसे वाकई लगता है कि उसने गलत नहीं किया है और तभी वह आगे बढ़ सकती है।

फ़िल्म अस्सी हमें मजबूर करती है कि हम हिंसा को सिर्फ एक घटना के रूप में न देखें। असली सवाल यह है कि क्या हम सर्वाइवर को सिर्फ उसके साथ हुई घटना से पहचानेंगे या उसे उसकी पूरी इंसानियत के साथ देख पाएंगे?

यह फिल्म बताती है कि यौन हिंसा का दर्द सिर्फ उस रात तक सीमित नहीं रहता। वह यादों, रिश्तों, पहचान और उम्मीद सब में फैल जाता है।

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