Women in Action Films यानी एक्शन फिल्मों में महिलाओं की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है और फिल्म ‘धुरंधर’ इसका ताज़ा उदाहरण है। चारों तरफ रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, अर्जुन रामपाल, संजय दत्त, आदि एक्टर्स की वाह-वाही हो रही है। मगर लोग ध्यान दें तो इस फिल्म में एक्ट्रेसेस भी हैं। सारा अर्जुन रणवीर सिंह के साथ हैं, तो सौम्या टंडन ने अक्षय खन्ना का साथ दिया है। फिल्म में आइटम सॉन्ग हैं, जिसमें क्रिस्टल डिसूजा और आयशा खान भी हैं, लेकिन किसी एक्ट्रेस का जिक्र उस तरह से नहीं हुआ, जैसे फिल्म के एक्टर्स का हो रहा है।
फिल्म में एक्शन सीन्स की जमकर तारीफ होती है, लेकिन एक्ट्रेसेस का किरदार अक्सर थम जाता है। कहानी आगे बढ़ती है, स्टंट्स और मिशन बढ़ते हैं… लेकिन हीरोइन जैसे एक जगह ठहर जाती है। वह एक ग्लैमरस डॉल, एक रोमांटिक पार्टनर या स्क्रीन पर थोड़ा-सा इमोशनल टच देने के लिए रह जाती है।
यहां बात सिर्फ ‘धुरंधर’ फिल्म की नहीं है, ऐसा कई एक्शन फिल्मों में होता है जहां एक एक्टर के पास दमदार रोल होता है और हीरोइन कुछ छोटे-मोटे सीन का हिस्सा रह जाती है। सवाल है कि बॉलीवुड के एक्शन सिनेमा में ये पैटर्न बार-बार क्यों दोहराया जाता है?
‘धुरंधर’ भी पुराने फॉर्मूले में बनी नई कहानी
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अगर मैं ‘धुरंधर’ जैसी फिल्म को ही लूं, तो भी हीरोइन के किरदार में कोई खास सीन नहीं है। सारा अर्जुन ने इस फिल्म में रणवीर सिंह का साथ दिया है। साफ शब्दों में कहें, सारा का किरदार बस रोमांटिक सीन्स तक सीमित है। वह फिल्म में एक 19 वर्षीय के किरदार में है, जिसे अपने पॉलिटिकल बैकग्राउंड से दूर अपनी अलग दुनिया बनानी है। मगर वह हीरो के लव इंटरेस्ट के अलावा ज्यादा कुछ नहीं रहती है। उसकी अपनी कहानी भी चंद सीन्स के बाद ठहर जाती है। वह न ही लव स्टोरी का हिस्सा बन पाती है और न पूरी तरह से इस फिल्म का।
सौम्या टंडन को ही लें, तो वह अक्षय खन्ना की वाइफ का रोल निभा रही हैं। कुछ जगहों पर उनके डायलॉग्स छोड़ दें, तो वह भी बस एक Housewife का किरदार निभा रही हैं। 90s के दौर में भी हीरो केंद्र में होता था और एक्ट्रेस गानों, रोमांस और ट्रैजेडी तक सीमित रहती थी। आज भी वही फॉर्मूला नए पैकेजिंग के साथ दोहराया जा रहा है।
कहानी हीरो के इर्द-गिर्द और हीरोइन के हिस्से में ‘स्पेस’ की कमी
बॉलीवुड में एक्शन फिल्मों की दुनिया सिर्फ Male-Centred रही है, जहां आतंकवाद, रिवेंज, इंटेलिजेंस ऑपरेशन या गैंगवार जैसे बड़े-बड़े प्लॉट्स चल रहे होते हैं। इन कहानियों में क्रिएटर्स का मेन फोकस हीरो की जर्नी पर ही होता है।
उसका दर्द,
उसके फैसले,
उसका मिशन,
उसके स्टंट्स… यही कहानी की धुरी बन जाते हैं। ऐसे में हीरोइन की प्रेजेंस जरूरी लगती है, लेकिन वह कहानी का हिस्सा नहीं, हीरो की जरूरत का हिस्सा बनकर रह जाती है। वह हीरो की दुनिया का एक्टिव कैरेक्टर नहीं, बस उस दुनिया को कंप्लीट करने का माध्यम बनती है।
यही कारण है कि हमारी फिल्मों में एक्ट्रेसेस के हिस्से में स्क्रीन-टाइम की कमी आती है। उसका कैरेक्टर आर्क लगभग शून्य हो जाता है। हमारी फिल्मों की हीरोइन पर्दे पर तो रहती है, लेकिन कहानी में अक्सर ‘नहीं’ रहती। और यह ट्रेंड नया नहीं है। 80s और 90s की मसाला फिल्मों से शुरू होकर 2000s के बड़े एक्शन फ्रेंचाइजी तक चलता आया है।
कई फिल्मों में बस Prop ही रही हैं बेहतरीन एक्ट्रेसेस
हीरो के पास ही बड़ा मिशन है, लेकिन अब कोई मिशन बगैर गाने-बजाने के कैसे पूरा हो सकता है? कैसे ग्लैमर के तड़के के बिना हीरो गैंग वॉर कर सकता है? अब अगर हीरो एंग्री मोड में है, तो उसके पत्थर जैसे दिल को पिघलाने के लिए कोई एक्ट्रेस तो चाहिए ही होती है। बॉलीवुड में न जानें कितनी फिल्में बस इसी एक कॉन्सेप्ट पर बनी हैं। कितनी बेहतरीन एक्ट्रेसेस सिर्फ और सिर्फ लव इंटरेस्ट बनकर रह चुकी हैं।
हीरो भले मिशन पर हो, लेकिन रोमांस बिना फिल्म अधूरी लगती है। और वही रोमांस लाने के लिए हीरोइन की एंट्री होती है। न, न.. वह मिशन में मदद करने नहीं आती, बल्कि मूड लाइट करने आती है। जैसे फिल्म ‘वॉर’ में टाइगर श्रॉफ और ऋतिक रोशन बड़े मिशन पर थे और वाणी कपूर का किरदार बस आइटम सॉन्ग तक सीमित था। फिल्म टाइगर जिंदा है में कटरीना के पास एक्शन सीन जरूर थे, लेकिन कहानी का फोकस 90% सलमान पर ही रहा। फिल्म ‘सूर्यवंशी’ में अक्षय कुमार जहां विलेन की बैंड बजाने आए हैं, वहीं कैटरीना कैफ के हिस्से बस गाने और दो-तीन ड्रामा सीन हैं। इसी तरह, ‘दबंग’ में तो सोनाक्षी सिन्हा सलमान खान की वाइफ ही बनी रह गई हैं। ‘पुष्पा’ में रश्मिका का किरदार याद है? नहीं न…किसी को याद नहीं है। बस गाने और अल्लू अर्जुन की एक्टिंग याद है।
और ये लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती… 90s की गदर, घायल जैसी फिल्मों से लेकर बागी, सिंह इज़ ब्लिंग, खिलाड़ी 786, बैंग-बैंग, जैसी लगभग हर एक्शन फिल्म यही पैटर्न दोहराती है।
क्या एक्ट्रेसेस नहीं कर सकती हैं Action?
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यह सोचना कि एक्ट्रेसेस एक्शन या इंटेंस मिशन-बेस्ड कहानियों को नहीं संभाल सकतीं पूरी तरह गलत धारणा है। कई एक्ट्रेसेस ने बार-बार साबित किया है कि जब उन्हें किरदार, स्कोप और स्क्रीनप्ले दिया जाता है, तो वे भी उसी दमदार एनर्जी के साथ पर्दे पर छा जाती हैं। आप ‘राज़ी’ में आलिया भट्ट का किरदार देखें। ‘आर्या’ में सुष्मिता सेन, ‘मर्दानी’ में रानी मुखर्जी, ‘कहानी’ में विद्या बालन और ऐसी कई फिल्में साबित करती हैं कि यदि अच्छी कहानी हो, तो एक्ट्रेसेस न सिर्फ ऑडियंस खींच सकती हैं, बल्कि अवॉर्ड्स भी जीत सकती हैं।
क्यों नहीं बनते एक्ट्रेसेस के लिए ज्यादा दमदार रोल?
सबसे अहम सवाल यही है कि जब राज़ी, मर्दानी, आर्या, नीरजा जैसी फिल्में और सीरीज़ सुपरहिट व क्रिटिकली अप्रीशिएटेड हो चुकी हैं, तो महिलाओं को एक्शन स्पेस क्यों नहीं दिया जाता? इसका जवाब मिलता है कि बॉलीवुड अब भी कमर्शियल एक्शन को सिर्फ मर्दों की दुनिया मानता है। स्पाई, RAW, ATS या गैंगवार जैसी थीमें मेल-ड्रिवन ही सही लगती हैं। या फिर हीरोइन पर कहानी टिके यह अब भी ‘अनसेफ’ माना जाता है, इसलिए शायद एक्सपेरिमेंट्स कम होते हैं।
ऐसी फिल्मों का परिदृश्य शायद तभी बदलेगा, जब हीरोइन सिर्फ गाने या रोमांस की वजह से नहीं, कहानी की जरूरत की वजह से स्क्रीन पर आएगी। हीरो भले छा जाए, लेकिन हीरोइन का गायब होना दर्शकों को स्वीकार नहीं होगा।
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