भारत जैसे देश में बेटों-बेटियों की परवरिश हमेशा अलग तरह से की जाती है। हमारे देश में लड़कियों को अक्सर एडजस्ट करना सिखाया जाता है। उन्हें बिहेव करने की हिदायत दी जाती है।

“ज़्यादा मत हंसो”

“लड़कियों की तरह बिहेव करो”

“थोड़ा तमीज़ से बैठो”

ये सिर्फ कुछ शब्द नहीं हैं, बल्कि ट्रेनिंग होती है। और ये ट्रेनिंग लड़कियों के लिए बचपन से ही शुरू हो जाती है। अगर कोई बच्ची ज़ोर से हंसती है, तो उसे क्यूट नहीं, लाउड बोला जाता है और चुप करा दिया जाता है। जब वो किसी बात का जवाब देती है, जो उसे तेज़ कह दिया जाता है।

अगर उसी घर में एक लड़का ज़ोर से बोले और चीज़ें तोड़ दे या पलटकर जवाब दे दे, तो कहा जाता है, “लड़के हैं, लड़के तो ऐसे ही होते हैं।” यहीं से एक बड़ा गैप आज जाता है परवरिश पर जहां पर लड़कियों को ‘तमीज़’ सिखाई जाती है और लड़कों के लिए सब कुछ जायज़ हो जाता है।

सवाल है कि यह बिहेवियर का सिलेबस सिर्फ लड़कियों के लिए क्यों है, जब लड़कों को शायद इसकी ज़्यादा ज़रूरत है! चलिए लेख में जानते हैं कि कैसे बेटों-बेटियों की परवरिश में अंतर नज़र आता है।

‘इज़्ज़त’ का बोझ सिर्फ एक जेंडर पर क्यों?

women vs men behavior standardsImage Source

एक लड़की को बचपन से सिखाया जाता है कि उसकी बॉडी लैंग्वेज भी मैसेज देती है। उसकी हंसी को लोग जज करते हैं। उसका चलना, बैठना, उठना, सब ‘इज़्ज़्त’ से लिंक है। पर क्या कभी किसी ने लड़के को कहा, ‘बेटा, रात को मत निकला करो इज़्ज़त खराब होगी?’ नहीं, क्योंकि सोसाइटी की नज़र में लड़की को ज़िम्मेदारी बना दिया है।

आप भले ही नोटिस करें या नहीं, लेकिन हर घर में एक इंविज़िबल रूल होता है कि बेटी घर की इज़्ज़त होती है। सवाल है तो बेटा, क्या फ्रीडम का लाइसेंस है?

हम अक्सर लड़कियों को प्रोटेक्ट करने के नाम पर उन्हें कंट्रोल करते हैं। और लड़कों को ट्रस्ट करने के नाम पर पावर दे देते हैं। बेटों-बेटियों की परवरिश में यह फर्क धीरे-धीरे बड़ा हो जाता है।

वहीं, यह कंडीशनिंग भी इतनी गहरी होती है कि लड़कियां ख़ुद अपने आप को अंडरएस्टिमेट करने लगती हैं। वे लोगों के बीच बोलने से पहले सौ बार सोचती हैं। अपनी बातों को शुरू करने से पहले ही सॉरी कह देती हैं और अपनी अचीवमेंट्स को भी डाउनप्ले करती हैं।

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Patriarchy का बनाया हुआ सिस्टम है

यह सब Patriarchy का बनाया हुआ सिस्टम है। औरतों को बिहेव करना इसलिए सिखाया जाता है, ताकि उन्हें कंट्रोल किया जा सके। एक औरत जो अपनी बात रखती है, अपनी ज़रूरतों को एक्स्प्रेस करती है और हर किसी को ख़ुश रखने की कोशिश नहीं करती, वो इस सिस्टम के लिए एक खतरा है।

लड़कों को इसके उलट कॉन्फिडेंस और एंटाइटलमेंट सिखाया जाता है। उन्हें बताया जाता है कि दुनिया उनकी है, वे जो चाहें कर सकते हैं। यही वजह है कि वर्कप्लेस में औरतें अपने आइडियाज़ के लिए क्रेडिट तक नहीं ले पातीं, रिलेशनशिप में अपनी बाउंड्रीज नहीं रख पातीं और पब्लिक स्पेस में आज़ादी से रह नहीं पातीं।

बेटों-बेटियों की परवरिश में फर्क आखिर क्यों किया जाता है? क्यों बेटियों को संभलकर रहना सिखाया जाता है और बेटों को खुलकर जीना?

आवाज़ उठाने की क़ीमत चुकाती हैं लड़कियां

cultural conditioning of womenImage Source

जब कोई औरत इस कंडीशनिंग को तोड़ने की कोशिश करती है, तो उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। उसे ‘Difficult’, ‘Aggressive’ या ‘Bossy’ कहा जाता है। उसे बार-बार याद दिलाया जाता है कि लड़कियां कैसे बिहेव करती हैं!

यह डर इतना गहरा बैठ जाता है कि कई औरतें ज़िंदगी भर अपनी असली पर्सनैलिटी को छुपाकर रखती हैं। वे अपनी महत्वकांक्षाओं को छोटा कर देती हैं, अपने गुस्से को दबा देती हैं और अपनी ज़रूरतों को इग्नोर कर देती हैं, सिर्फ़ इसलिए कि उन्हें ‘अच्छी लड़की’ बने रहना है।

हर लड़की के मन में एक चेकलिस्ट होती है। वो कॉन्शियस होती रहती है कि उसे सॉफ्ट तरीके से बोलना है। सीधे बैठना है, ज़्यादा एंबिशियस नहीं होना और ज़्यादा वीक भी नहीं दिखना है।

एक परफेक्ट बैलेंस बनाने के लिए वे जद्दोजहद करती हैं, ताकि गलती से भी समाज के आगे नोटिस न हो जाएं। अब सोचिए कि सिर्फ ‘Accetable’ बनने में कितनी एनर्जी चली जाती है।

कितनी लड़कियां अपनी असली आवाज़ खो देती हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें बचपन से कहा गया है कि लड़की जैसे बिहेव करो। बेटों-बेटियों की परवरिश में यह बड़ा फर्क अक्सर लड़की के लिए नासूर बन जाता है।

बेटों-बेटियों की परवरिश में बदलाव ज़रूरी!

इस साइकिल को तोड़ने का सिर्फ़ एक रास्ता है कि हम अवेयरनेस फैला सकें । हमें यह समझना होगा कि बिहेव करना सिर्फ एक जेंडर की ज़िम्मेदारी नहीं है।

लड़कियों को बचपन से यह सिखाना ज़रूरी है कि उनकी आवाज़ मायने रखती है, उनकी राय ज़रूरी है और उन्हें किसी को ख़ुश रखने के लिए ख़ुद को छोटा करने की ज़रूरत नहीं है। और सबसे ज़रूरी है कि हमें यह समझना होगा कि एक औरत का लाउड होना, ओपिनियन रखना या स्पेस लेना कोई गलत बर्ताव नहीं है।

ऐसे में यह समझना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि जब एक जेंडर को कंट्रोल और दूसरे को कॉन्फिडेंस दिया जाता है, तो सोसाइटी बैलेंस नहीं, Bias क्रिएट करती है। इसलिए बेटों-बेटियों की परवरिश में बदलाव ज़रूरी है।

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