बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का हिजाब विवाद सुर्खियों में था कि अब एक और विवाद तूल पकड़ चुका है। पहले नीतीश कुमार का एक सार्वजनिक मंच पर महिला डॉक्टर का हिजाब खींचना और उसके बाद यूपी के मंत्री का यह कहना, “नकाब छू दिया तो इतना हो गया… कहीं और छू देते तो क्या होता?” ये दोनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। ये एक ही सोच की कड़ियां हैं। एक ऐसी सोच, जहां महिलाओं की मर्यादा को हल्के में लिया जाता है और असंवेदनशीलता को मज़ाक का नाम देकर टाल दिया जाता है।
यह सिर्फ एक हिजाब खींचने या एक बयान देने की बात नहीं है। यह उस मानसिकता की झलक है, जिसमें महिला की बॉडी, उसकी पहचान और उसकी सहमति को गंभीर मुद्दा नहीं माना जाता।
हिजाब सिर्फ कपड़ा नहीं, एक निजी फैसला है
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हिजाब किसी महिला की धार्मिक पहचान हो सकता है, उसका निजी चुनाव हो सकता है या उसका आत्म-सम्मान हो सकता है। मंच पर खड़ी एक महिला के हिजाब को बिना पूछे छूना या हटाना, उसके निजी दायरे में जबरन घुसना है। जब ऐसा कोई आम आदमी करता है, तो वह गलत है। लेकिन जब ऐसा कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति करता है, तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। क्योंकि सत्ता के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है।
फिर चाहे हिजाब हो, दुपट्टा हो या पल्लू किसी को यह अधिकार नहीं कि वह बिना पूछे किसी महिला के कपड़े छुए। यह उसकी व्यक्तिगत पसंद है, उसकी गरिमा है।
मज़ाक के नाम पर महिलाओं की बेइज़्ज़ती कब तक?
नीतीश कुमार हिजाब विवाद पर जब यूपी के मंत्री डॉ. संजय निषाद से पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही वाहियाद तरीके से इस पर टिप्पणी की। निषाद ने नीतीश कुमार का बचाव करते हुए कहा, “वो भी तो आदमी हैं ना।” मतलब? क्या मर्द होना गलत व्यवहार का लाइसेंस है? क्या पुरुषों से तहज़ीब और संयम की उम्मीद नहीं की जा सकती?
यह वही सोच है जो बलात्कार के बाद पूछती है, “लड़की रात को बाहर क्यों थी?” यह वही मानसिकता है जो अपराधी की जगह पीड़िता को दोष देती है।
यह वही सोच है, जो रेप जोक्स को “डार्क ह्यूमर” कहती है। जो कहती है कि इतना सीरियस क्यों हो रही हो? मज़ाक ही तो है। लेकिन सवाल यह है कि मज़ाक किसकी कीमत पर?
नीतिश कुमार-डॉ. संजय निषाद कॉन्ट्रोवर्सी पर अलका लांबा की प्रतिक्रिया

इस पर ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस की प्रेजिडेंट अलका लाम्बा ने अपनी राय रखी है। वह कहती हैं, “संवैधानिक पद पर बैठे हुए लोग जब ऐसी हरकतें या टिप्पणियां करते हैं, तो इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना सिर्फ गलत नहीं, बल्कि एक दंडनीय अपराध है और हमारे कानून में इसके लिए सख्त सजा का प्रावधान है।”
ऐसी हरकतें और बयान किसी व्यक्ति की मानसिकता को उजागर करते हैं। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जब नीतिश जी की हरकत पर जवाबदेही तय करने के बजाय, संजय निषाद जैसे लोग उस पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और उससे भी ज्यादा अश्लील व भद्दी टिप्पणी करते हैं।
भाषा, संस्कृति या लोकाचार की आड़ में महिलाओं के अपमान को जायज़ ठहराना न सिर्फ असंवेदनशील है, बल्कि यह बताता है कि सरकार की सह में बैठे कुछ लोग आज भी महिलाओं को ऑब्जेक्ट की तरह देखते हैं।
ऐसी तुच्छ सोच, ऐसी बयानबाज़ी और ऐसी राजनीति लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए खतरा है और समाज को इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट कमेलश जैन ने बताया शर्मनाक
सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट कमलेश जैन भी मुख्यमंत्री की हरकत और डॉ. संजय निषाद के बयान की निंदा करती हैं। वह कहती हैं, “हमारे कानून में Bharatiya Nyaya Sanhita की धारा 79 के तहत किसी महिला की मॉडेस्टी को नुकसान पहुंचाना एक बड़ा अपराध है। इसके लिए सज़ा हो सकती है। ऐसे में बिहार के मुख्यमंंत्री ने जो किया, वो दुखद है। इस तरह के बयान और व्यवहार के लिए सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि महिलाएं भी इंसान हैं, ‘ऑब्जेक्ट’ नहीं।”
भाषा और संस्कृति की आड़ में मज़ाक करना गलत
निषाद ने अपना बचाव करते हुए कहा कि यह उनकी ‘भोजपुरी शैली’ थी। वह बोले, “मैंने सिर्फ बात को टालने और विवाद न बढ़े इसलिए ऐसा कहा था। पूर्वांचल में बात टालने के लिए कह देते हैं कि फलनवा ई बतिया कहल अउर कुछ नाहीं कहल नै, छोड़ै जाए दा। मैंने हंसते हुए ऐसा ही कहा था।”
यह बचाव पूरी भोजपुरी संस्कृति का अपमान है। कोई भी भाषा, कोई भी संस्कृति इसे हल्का नहीं बना सकती है। यह सिर्फ गंदी सोच को क्षेत्रीयता की आड़ में कह देने की घटिया कोशिश है।
हम बार-बार देखते हैं कि जब भी किसी नेता से कोई गलत हरकत हो जाती है, तो उसे डिफेंड करने के लिए बयान आ जाते हैं। कभी कहा जाता है कि उनका इरादा गलत नहीं था, कभी कहा जाता है कि बात को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है।
लेकिन महिलाओं से जुड़ी हर घटना में यही पैटर्न क्यों?
महिला की Dignity और Modesty कोई “सेंसिटिव इश्यू” नहीं, बल्कि एक बुनियादी अधिकार है। उसे छूने से पहले, उस पर टिप्पणी करने से पहले, उस पर मज़ाक बनाने से पहले रुककर सोचना ज़रूरी है। क्योंकि जब नेता इस तरह के उदाहरण सेट करते हैं, तो समाज भी वही सीखता है कि महिलाओं की सीमाएं मायने नहीं रखतीं।
आखिर में यह सिर्फ हिजाब का मामला नहीं है। यह इस बात का मामला है कि क्या हम एक ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहां सत्ता में बैठे लोग महिलाओं के साथ कुछ भी कर सकें, कुछ भी बोल सकें और फिर “मजाक था” कहकर बच निकलें?
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