कल का मैच हर भारतवासी के लिए खास था। कल भारतीय महिला क्रिकेट टीम का सेमी-फाइनल मैच ऑस्ट्रेलिया के साथ था। मैच जीतने के साथ ही ‘इंडिया…इंडिया…’ के नारे लगे, तो जेमिमा रॉड्रिग्स स्टार बनकर निकलीं। उन्होंने न सिर्फ गजब की पारी खेली, बल्कि मैच के बाद जो कहा, उसने सबका दिल जीत लिया। अपने इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि वह कितने लंबे समय से anxiety से जूझ रही थीं। Jemimah Rodrigues ने अपनी मेंटल हेल्थ के बारे में बात करके साबित किया कि महिलाएं भावुक हो सकती हैं, संवेदनशील हो सकती हैं, लेकिन कमजोर कभी नहीं हो सकती हैं। वे तमाम परेशानियों से जूझकर भी विजेता बनकर उभरती हैं।
आज जब दुनिया औरतों से हर पल मजबूत रहने की उम्मीद रखती है, तब जेमिमा का यह स्वीकारना याद दिलाता है कि महसूस करना, रो पड़ना और फिर मुस्कुराकर आगे बढ़ जाना भी बड़ी जीत है। मेंटल हेल्थ पर बात करके उन्होंने यह भी बताया कि इस पर खुलकर बात करना कितना जरूरी है।
हमने फोर्टिस हॉस्पिटल की सीनियर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. भावना बर्मी से मेंटल हेल्थ पर चर्चा की और उनसे यह जाना कि एंग्जायटी या किसी भी स्ट्रेस से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है।
जेमिमा रॉड्रिग्स की मेंटल हेल्थ पर चर्चा क्यों बनी खास?
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जेमिमा रॉड्रिग्स ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 127 रन बनाकर प्लेयर ऑफ द मैच बनीं। भारत की जीत दर्ज कराने के बाद वह भावुक हो गईं और उन्होंने इंटरव्यू में खुलासा किया वह Anxiety से जूझ रहीं थीं।
जेमिमा ने कहा, “मेरे लिए यह सब पिछले महीने काफी मुश्किल था। मुझे यह एक सपने जैसा लगता है और अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा है। पिछले साल मुझे विश्व कप से बाहर कर दिया गया था। मैं अच्छे फॉर्म में थी, लेकिन चीजें लगातार बिगड़ती रहीं और मैं कुछ भी कंट्रोल नहीं कर सकी। मैं इस दौरे के दौरान लगभग हर दिन रोया करती थी।”
जेमिमा के इस प्रेस कान्फ्रन्स ने कई महिलाओं के लिए आगे बढ़कर मदद मांगने का रास्ता बनाया है। उन्होंने दर्शाया है कि सफलता का मतलब सिर्फ जीत नहीं, बल्कि अपने भीतर की जंग को पहचानना भी है।
बढ़ती उम्मीदें और दबाव: क्यों महिलाएं ज्यादा महसूस करती हैं?

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महिलाओं को आसानी से बड़ा मंच नहीं मिलता। उन्हें उसके लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है। और अगर उन्हें मंच बड़ा मिल जाए, तो उनसे उम्मीदें भी ज्यादा होने लगती हैं। यही कारण है कि उनका मानसिक दबाव भी कई गुना बढ़ जाता है।
डॉ. बर्मी समझाती हैं, “महिलाओं को बचपन से ही अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझना और रिश्ते संभालना सिखाया जाता है। इसी वजह से वे तनाव और चिंता को जल्दी महसूस करती हैं। यही कारण है कि वे कई बार खुद पर ज्यादा सख्त भी हो जाती हैं।”
ऐसे में जेमिमा रॉड्रिग्स जैसी खिलाड़ी जब विश्व मंच पर उतरती हैं, तो उनसे सिर्फ रन बनाने या मैच जिताने की उम्मीद नहीं होती, बल्कि उनसे मुस्कुराने, धैर्य रखने और हमेशा परफेक्ट दिखने की भी उम्मीद की जाती है। यह दबाव उन्हें हर समय बैलेंस्ड दिखने के लिए मजबूर करता है।
जेमिमा ने इस नकाब को उतार फेंका और अपनी मेंटल हेल्थ के बारे में खुलकर विचार रखे। उन्होंने बताया कि अपनी कमजोरी पर बात करना गलत नहीं है।
कमजोरी नहीं, हिम्मत की निशानी
जेमिमा रॉड्रिग्स ने यह दर्शाया है कि भावनाएं छिपाने से नहीं बल्कि उन्हें स्वीकारने से ताकत मिलती है। जेमिमा ने अपने डर, चिंता और असुरक्षा को छिपाने की बजाय उन्हें आवाज दी। यही उनकी असली जीत थी।
डॉ. भावना बर्मी कहती हैं कि यह भावनात्मक ईमानदारी एंग्जायटी और स्ट्रेस से निपटने के लिए बेहद जरूरी है। यह खुद को समझने का एक साहसिक कदम है। “जब हम अपनी भावनाओं को स्वीकारते हैं, तो हम लाइट फील करते हैं। भावनाएं दबाने से तनाव बढ़ता है। यह धीरे-धीरे बर्नआउट का रूप ले लेता है।”
Anxiety और Stress से कैसे निपटा जा सकता है?

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हाई प्रेशर का माहौल हो, तो हर इंसान के लिए स्ट्रेस होना स्वाभाविक है। हालांकि, महिलाओं के लिए बोझ थोड़ा ज्यादा हो जाता है। वे अक्सर एक साथ कई मानसिक जिम्मेदारियां निभाती हैं, इसलिए कई बार उनकी बेचैनी गहरी हो जाती है।
डॉ. बर्मी के मुताबिक ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ मानसिक नहीं, बल्कि शारिरिक रूप से भी मेहनत करने की जरूरत होती है।
- एंग्जायटी से निपटने के लिए डीप ब्रीदिंग, माइंडफुलनेस और पॉजिटिव थिंकिंग जैसे तरीके मदद करते हैं और नर्वस सिस्टम को शांत करते हैं।
- ऐसा माहौल बनाना भी जरूरी है जहां आप अपनी कमजोरियों या थकान को खुलकर व्यक्त कर सकें, बिना ये महसूस किए कि इससे आपकी क्षमता पर सवाल उठेगा।
- सेल्फ-कम्पेशन एंग्जायटी और स्ट्रेस से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार है। जरूरी है कि आप पहले खुद को इंसान समझें। खुद पर दया दिखाएं। खुद के लिए काम करें। यही असली हिम्मत है।
जेमिमा रॉड्रिग्स का मेंटल हेल्थ पर बात करना हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो मुस्कान के पीछे अपनी जंग छिपाती है।
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