बेस्ट सेलिंग लेखक अमीश त्रिपाठी किसी इंट्रोडक्शन के मोहताज़ नहीं हैं। उनके उपान्यास और उनकी राइटिंग उनके बारे में बहुत कुछ कहती है। अमीश ने अपने उपन्यासों के जरिए एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां लोग उन कैरेक्टर्स को भी जान पाते हैं, जिनके बारे में लोगों को अंदाजा नहीं है या उनकी समझ कम है। हाल ही में, अमीश त्रिपाठी की नई किताब The Chola Tigers: Avengers of Somnath लॉन्च हुई। यह उनके Indic Chronicles श्रृंखला का दूसरा पार्ट है, जिसमें चोल साम्राज्य की वीरता का उन्होंने वर्णन किया है। हमारे पॉडकास्ट After Hours में अमीश त्रिपाठी ने अपनी किताब का जिक्र किया। इसके साथ ही, उन्होंने होस्ट बानी जी. आनंद के साथ कई दिलचस्प पहलुओं पर बात की। अमीश ने बैलेंस्ड और डिसरप्टिव फेमिनिज़्म पर भी अपने इनसाइट्स शेयर किए। फेमिनिज़्म पर अमीश त्रिपाठी के विचार और नज़रिया क्या है, चलिए जानते हैं।
“औरतों का सम्मान करने के लिए पुरुषों से नफरत करने की जरूरत नहीं है”

फेमिनिज़्म की परिभाषा सभी के लिए अलग है। पित्तृसत्ता वाले समाज में नारीवाद की राह कभी आसान नहीं रही। यहां हर कदम पर सवाल भी उठते हैं और संघर्ष भी, लेकिन बदलाव की हर छोटी कोशिश बड़ी दिशा दिखाती है। वहीं, फेमिनिज़्म पर अमीश त्रिपाठी के विचार कुछ कुछ इस तरह हैं, “आपको महिलाओं का सम्मान करने के लिए पुरुषों से नफरत करने की जरूरत नहीं है। हम वेस्टर्न नहीं है। वहां यह काफी एक्स्ट्रीम है और मैं इसे डिसरप्टिव फेमिनिज़्म समझता हूं।”
अमीश बताते है कि पश्चिमी देशों में फेमिनिज़्म कभी-कभी बहुत आगे चला जाता है। उन्होंने देखा है कि कभी-कभी अधिकारों की लड़ाई इतनी बढ़ जाती है कि संतुलन और समझ खो जाता है और पुरुषों के खिलाफ झुकाव बढ़ जाता है।
“हमारे यहां हमेशा सभी के लिए जगह और अपनापन रहा है।”
हमारे देश ने सभी को अपनाया है। हमारी संस्कृति ने सभी को सहेजकर रखा है और यही हमारी ताकत भी है। हमारे देश जैसी बात आपको विदेश में देखने को नहीं मिलेगी और यही अमीश भी मनाते हैं।
लेखक भी मानते हैं कि भारतीय सांस्कृतिक स्ट्रक्चर में हमेशा संतुलन रहा है। इसे विस्तार से समझाते हुए उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि पश्चिमी देशों में कभी-कभी ट्रांसजेंडर अधिकारों की बातें भी महिलाओं से नफरत करने जैसा रूप ले लेती हैं। भारत में ऐसा नहीं है। हमारे यहां किन्नर अखाड़ा सदियों से मौजूद है और सबसे बड़ा उदाहरण है अर्धनारीश्वर, जो दर्शाता है कि हमारा समाज हमेशा संतुलित नजरिया अपनाता रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि किसी को अधिकार देने के लिए महिलाओं से नफरत करनी पड़े।”
अमीश कहते हैं कि हमारे देश में ऐसा नहीं होता है और इसी कल्चरल बैलेंस को हम फिर से जीवित कर सकते हैं। वह मानते हैं कि हमें पुरानी परंपराओं और तरीकों को याद करना चाहिए, जिन्हें अपनाना अब भी जरूरी है। अमीश त्रिपाठी का पूरा पॉडकास्ट यहां देखें-
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