हमारे देश में जहां ‘मां’ को त्याग की मूरत समझा जाता है, वहां जब कोई लड़की यह ऐलान करती है कि उसे बच्चे नहीं चाहिए, तो उसे अलग नज़रों से देखा जाता है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि मदरहुड एक चॉइस हो?
सोसाइटी ने हर महिला के अंदर इस बात को बीज की तरह बो दिया है कि उन्हें एक न एक दिन मां बनना ही है। यह एक चॉइस हो सकती है, इसके बारे में उन्होंने इसलिए कभी सोचा भी नहीं।
मगर आज शायद नज़रिया धीरे-धीरे बदल रहा है। महिलाएं इसे एक ऑप्शन की तरह देखने लगी हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की 2023 रिपोर्ट में इसका ज़िक्र भी मिलता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019-21 में child-free women की संख्या 12% थी। हालांकि, यह बदलाव कैसे आया और क्यों अब महिलाएं मदरहुड को एक ऑप्शन या चॉइस की तरह देख रही हैं, जानना ज़रूरी है।
मदरहुड को ऑप्शन की तरह क्यों ले रही हैं महिलाएं?
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इंडियन वीमेन मदरहुड को आज एक ऑप्शन की तरह ले रही हैं, क्योंकि वे अपने करियर, फाइनेंशियल फ्रीडम और अपनी पहचान को ज़्यादा अहमियत दे रही हैं। कई महिलाओं को यह भी लगता है कि आज की दुनिया बच्चों के लिए उतनी सेफ या आसान नहीं है। वहीं, इस बदलते ट्रेंड के पीछे ये कारण भी हैं-
करियर के कारण
आज महिलाएं अपने काम और करियर को बहुत सीरियसली ले रही हैं। वे फाइनेंशियली स्ट्रॉन्ग होना चाहती हैं। अपनी मेहनत से एक बेहतर ज़िंदगी जीना चाहती हैं।
कई महिलाएं और कपल्स मिलकर यह तय करते हैं कि वे बिना बच्चों के भी खुश रह सकते हैं। वे DINK (Double Income No Kids) लाइफस्टाइल को चुन रहे हैं। वे घूमना, नई चीज़ें सीखना और अपने हिसाब से ज़िंदगी जीना चाहते हैं।
बच्चों की परवरिश के बढ़ते खर्च के कारण
आज के समय में बच्चे पालना आसान नहीं है। अच्छी पढ़ाई, इलाज और डेली नीड्स का खर्च बहुत ज़्यादा हो गया है। इसी वजह से कई महिलाएं और कपल्स यह सोचते हैं कि वे उतनी ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं या फिलहाल इसे टालना बेहतर समझते हैं।
अपनी आज़ादी छिन जाने के डर के कारण
अब महिलाएं सिर्फ़ पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। वे अपनी पहचान खुद बनाना चाहती हैं।
कई महिलाओं को लगता है कि बच्चे होने के बाद उनकी आज़ादी कम हो सकती है और ज़्यादातर ज़िम्मेदारी उन्हीं पर आ जाती है। इसलिए मदरहुड को न चुनना उनके लिए ज़्यादा अच्छा ऑप्शन है।
बदलते फैमिली स्ट्रक्चर के कारण
पहले जॉइंट फैमिली होती थी, जहां बच्चों की देखभाल में कई लोग मदद करते थे। अब ज़्यादातर लोग छोटे परिवार में रहते हैं, जहां सारी ज़िम्मेदारी मां-बाप पर ही होती है। ऐसे में बच्चों की परवरिश और भी मुश्किल लगने लगती है। इसलिए यह भी एक कारण है कि महिलाएं मदरहुड से बच रही हैं।
महिलाओं का मदरहुड न चुनना क्यों है Taboo?
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हमारे समाज में मदरहुड को एक खूबसूरत अनुभव से ज़्यादा एक ज़िम्मेदारी की तरह देखा जाता है। मां बनने को इतना ज़्यादा हाइप किया गया है कि उससे एक लड़की की पहचान जुड़ जाती है। ऐसे में अगर कोई बच्चा नहीं चाहता, तो उसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता।
अक्सर एक चाइल्ड-फ्री महिला से ऐसे सवाल किए जाते हैं, जो उस पर दबाव बनाते हैं। जैसे-
“पक्का, तुम बाद में पछताओगी तो नहीं?”
“अगर तुम्हारा बाद में बच्चे करने का मन किया तो?”
“लेकिन बायोलॉजिकल क्लॉक का क्या?”
ऐसे सवाल या कंसर्न अक्सर पर्सनल चॉइस में दखल देने वाले होते हैं। समाज ने लंबे समय तक यह तय किया है कि एक महिला की ज़िंदगी का “सही रास्ता” क्या होना चाहिए। लेकिन अब महिलाएं खुद यह तय कर रही हैं कि उनके लिए क्या सही है और शायद यही बदलाव सबसे ज़्यादा लोगों को अनकम्फर्टेबल कर रहा है।
क्या ज़िंदगी मदरहुड के बिना वाकई अधूरी है?
सोसाइटी यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि यह एक महिला के लिए उसकी चॉइस हो सकती है। जहां केवल वो तय करेगी कि उसे अपना प्यार और देखभाल किसे देनी है। इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि वो nurturing के खिलाफ है, वो बस इसे बायोलॉजिकल रोल से जोड़कर नहीं देखना चाहती है।
ज़िंदगी मदरहुड के बिना अधूरी है, ऐसा नहीं है। आपके रिश्ते, आपकी ज़िंदगी जीने का तरीका, आपका काम, दोस्ती या सिर्फ़ खुद के साथ समय बिताना- यह भी लाइफ को कंप्लीट करता है।
फिर सवाल यह भी है कि लोग ऐसे सवाल आदमी से क्यों नहीं पूछते हैं? अगर यह माना जा रहा है कि एक महिला की ज़िंदगी मां न बनने पर अधूरी है, तो आदमी की ज़िंदगी भी उतनी ही अधूरी होगी न?
ऐसे फैसले अगर पुरुष ले, तो उसे लॉजिकल माना जाता है। यह दिखाता है कि कैसे हम आज भी ऑटोनॉमी और इमोशन्स को जेंडर के हिसाब से जज करते हैं।
बात बस मदरहुड की नहीं है, यह एक लड़की की चॉइस और उसकी वैल्यू की बात है। यह स्टेप हमेशा बोल्ड नहीं होता, कई बार कुछ महिलाओं के लिए पर्सनल भी होता है। इसलिए इसके लिए एक्सप्लेनेशन देना ज़रूरी भी नहीं।
इसका मतलब यह भी नहीं है कि मदरहुड की इंपॉर्टेंस कम है। किसी के लिए यह लाइफ-चेंजिंग एक्सपीरियंस हो सकता है। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि हर महिला को ऐसा ही लगे।
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